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जौनपुर : पूर्वांचल विश्वविद्यालय की बलि दे दी जाए , बर्दास्त नही : डॉ विजय सिंह ।

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जौनपुर। आज़मगढ़ राज्य विश्वविद्यालय के निर्माण में शासन द्वारा लिए गए कुछ फैसलों ने वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के अस्तित्व पर संकट ही खड़ा कर दिया है।गोमती के पावन तट पर बसे कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के विरासत को अपने मे समेटे हुए जौनपुर ज़िले में पूर्वांचल विश्वविद्यालय की स्थापना ने देश और प्रदेश में ज़िले को पहचान दी है और आज यह विश्वविद्यालय पुनः एक और विभाजन की कगार पर खड़ा है।

वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ विजय कुमार सिंह ने कहा कि आज़मगढ़ विश्वविद्यालय बने और आगे बढ़े हम उसका समर्थन करते है किन्तु इसके लिए शिराज़-ए-हिन्द की शैक्षणिक पहचान के प्रतीक पूर्वांचल विश्वविद्यालय की बलि दे दी जाए ये कदापि बर्दास्त नही होगा।Vbspuबिना शासन के वित्तीय सहायता मिले, अपने निजी स्रोतों और छात्रों की फीस से येन केन प्रकारेण खुद को सम्हालने वाला विश्वविद्यालय जो कभी 12 ज़िलों तक फैला था आज 4 ज़िलों तक सिमटा है अब 2 ज़िलों तक सिमट कर रह जायेगा,ऊपर से शासन का यह आदेश कि आज़मगढ़ विश्विद्यालय के निर्माण में 100 करोड़ पूर्वांचल विश्वविद्यालय प्रदान करे यह खुला अन्याय होगा।

विवेकसम्मत निर्णय यह होता कि अवध विश्वविद्यालय के कई जिलों में से जौनपुर ज़िले की सीमा से सटे दो ज़िले पूर्वांचल विश्वविद्यालय से सम्बद्ध किये जाते और आज़मगढ़ राज्य विश्वविद्यालय के निर्माण हेतु शासन द्वारा धन की व्यवस्था की जाती।

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किन्तु इसके विपरीत जहाँ विश्वविद्यालय को तोड़कर एक नया विश्वविद्यालय बनाया जा रहा है वहीं पहले से ही कर्मचारियों के वेतनादि आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे मातृ विश्वविद्यालय पर आधारभूत स्थापना राशि का बोझ लाद देना अन्याय है।

डॉ विजय सिंह ने समस्त जनपद वासियों,जनप्रतिनिधियों और प्रबुद्धजनों से यह अपील की है कि,अगर पूर्वांचल विश्वविद्यालय के गरिमा और अस्तित्व को बचाना है, जनपद के शिक्षा स्तम्भ को दृढ़ और मजबूत बनाये रखना है तो सभी को शासन तक ज़ोरदार ढंग से अपनी भावनाएं पहुँचानी होंगी।

आज़मगढ़ विश्वविद्यालय बने लेकिन पूर्वांचल विश्वविद्यालय ध्वंसावशेष और उसके अस्तित्व नाश के कीमत पर नही।पूर्वांचल विश्वविद्यालय ने आज तक सिर्फ बलिदान दिया है, आज उसकी रक्त शिराओ को भी संजीवनी की आवश्यकता है,इसलिए पूर्वांचल। में ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाली इस संस्था को , भौगोलिक रूप से निकटवर्ती दो ज़िले और दिए जाएं ,साथ ही आर्थिक समस्याओं के झंझावात से टूटते हुए इस विश्वविद्यालय से किसी और के लिए आर्थिक अनुदान की उम्मीद न की जाए।

यदि शासन हमारी भावनाओं पर सहानुभूति पूर्वक विचार नहीं करता है तो हमें बाध्य होकर अपने शिक्षा के मंदिर की रक्षा के लिये आगे कदम बढ़ाने पड़ेंगे।

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